एकलव्य ने अपना अंगूठा काटकर गुरु द्रोण को क्यों दिया था , Eklavya angoota katne ki story

द्वापर युग के टाइम में एक से बड़े एक धनुर्धर हुए कोई कहता है सबसे बड़े धनुर्धर कर्ण थे तो कोई कहता है सबसे बड़े धरमधारी अर्जुन थे तो कोई कहता है कि अगर एकलव्य का अंगूठा काटा ना होता तो सबसे बड़ा धरमधारी वह होता इतिहास के बारे में सभी लोग अलग-अलग तरह की बातें करते हैं लेकिन जैसे कि आपको मालूम होगा महाभारत का पूरा चित्रण भगवान कृष्ण के प्रपंचों के द्वारा संचालित किया गया, और द्वापर युग में एक ऐसा भी योद्धा हुआ था जिसने अपने बालपन के दौरान ही अपने उस गुरु जिससे उसने कभी सामने से किसी तरह का ज्ञान प्राप्त नहीं किया केवल चुप-चुप कर उनके द्वारा सुने गए शब्दों और सिख को लेकर कुछ ज्ञान प्राप्त किया था और उन गुरु द्रोण के मात्र एक बार कहने पर अपने हाथ से अंगूठा काट कर दे दिया था, महाभारत के उसे बालक एकलव्य की कहानी जानिए,

द्वापर युग में मिलने वाली शिक्षा,

पुराने समय में दोस्तों गुरुकुल मैं गुरु और ब्राह्मणों के द्वारा शिक्षा प्राप्त करवाई जाती थी, और उस टाइम पर केवल ऊंचे कुल के लोगों को ही शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार हुआ करता था जो की छतरियां वंश ब्राह्मण वंश या किसी ऊंचे वंश से ताल्लुक रखते हो, और उस टाइम पर शिक्षा की खास बात यह थी कि उसमें सभी तरह के अस्त्र-शास्त्र इसके अलावा जो व्यक्ति जिस चीज में उच्च हो उसका ज्ञान देना अस्त्र और शास्त्र के अलावा शास्त्र का ज्ञान देना एक अच्छा मनुष्य बनाना सभी तरह की चीज सिखाई जाती थी, और उस टाइम पर ऐसा भी हुआ करता था कि ऊंची जाति के लोगों के अलावा नीची जाति के लोगों को किसी तरह की अस्त्र-शस्त्र विद्या प्राप्त करने का अधिकार नहीं हो करता था और कहा जाता है कि उन जाति में से ही एकलव्य आते थे जैसे की महाभारत के वीर योद्धा कर्ण भी सूत जाति से थे तो उन्होंने झूठ बोलकर शिक्षा प्राप्त की थी लेकिन इस वीडियो में एकलव्य की बात कर रहे हैं तो उनके बारे में ही जानेंगे,

गुरु द्रोण ने एकलव्य को शिक्षा देने से इनकार किया था,

गुरु द्रोणाचार्य शिक्षा देने वालों में उसे टाइम पर एक बहुत बड़े गुरु थे और एकलव्य के मन में भी उनसे धनुर विद्या की शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा थी जिसके लिए उसने गुरु द्रोण के पास जाकर शिक्षा प्राप्त करने की बात कही लेकिन जो कि गुरु द्रोण केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय को ही शिक्षा दिया करते थे जिसके लिए उन्होंने एकलव्य को शिक्षा देने से मना कर दिया लेकिन एकलव्य के मन में धनुर विद्या सीखने की बहुत ही ललक थी जिसके लिए उसने मना करने के बावजूद भी जंगल में ही कुटिया बनाकर रहने लगा और गुरु द्रोण के द्वारा अन्य राजकुमार को सिखाई जा रही शिक्षा को सुन सुनकर प्रयास करने लगा था,

गुरु द्रोणाचार्य ने मांगा था एकलव्य से अंगूठा

राजकुमारों को शिक्षा देने के दौरान एक बार गुरु द्रोण बन में अभ्यास करने के लिए निकले थे तो उनको जंगल में एक तीर दिखा जो की अलग था तो यह मालूम करने के लिए की यह तीर किसका है ढूंढते हुए भी एकलव्य की कुटिया के पास जा पहुंचे तो उनको मालूम पड़ा कि यह भी विद्या सीखने हैं और उसे टाइम पर उनके पास एक कुत्ता खड़ा होकर भूख रहा था जिसको की एकलव्य ने उसे कुत्ते का मुंह बंद करने के लिए इस तरह बढ़ चलाया कि केवल कुत्ते का मुंह बंद हो जाए और उस किसी तरह की चोट ना आए उसके बाद कुत्ता चिल्लाते हुए गुरु द्रोण के पास गया तो वहां पर सब लोग देखकर अक्षर चकित हो गए की कोई इतनी कुशलता से किस तरह बढ़ चला सकता है इसके बाद में सभी लोग यह मालूम करने के लिए की किसने इस तरह बाण चलाया वन में ढूंढने लगते हैं तो एक कुटिया में जाकर वह पाते हैं कि उसे कुटिया में गुरु द्रोण की मूर्ति होती है जिसके सामने की एकलव्य धाम विद्या का प्रयास किया करता था उसके बाद उन सब को जानकारी मिलती है कि इसमें एकलव्य रहता है और वह भी धनु विद्या का प्रयास करता है लेकिन गुरु द्रोण के मन में केवल अर्जुन को सबसे बड़ा योद्धा बनाने की इच्छा थी और उसे टाइम पर उनको लगा था कि एकलव्य अर्जुन से बड़ा योद्धा बन सकता है जिस कारण से गुरु द्रोण ने एकलव्य से उसके हाथ का अंगूठा मांग लिया था और एकलव्य ने बिना कुछ बोले गुरु के मांगने पर अंगूठा काट कर दे दिया था, तो इस तरह एकलव्य ने अपने गुरु के मंत्र कहने से ही अंगूठा काट कर दे दिया था

Disclaimer

हमने आपको इस आर्टिकल में महाभारत के एक योद्धा एकलव्य की कहानी बताइए eklavya story कि उसने किस तरह अपने हाथों से ही अपना अंगूठा काटकर अपने गुरु को अर्पित कर दिया था

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