महाभारत के कर्ण की कहानी, karan story in mahabharat

महाभारत का एक ऐसा योद्धा जो की युद्ध में हार गया और मारा गया लेकिन उसके बाद भी जब महाभारत की बात आती है तो उसके किरदार को जरूर याद किया जाता है महाभारत में करण सही था या गलत था यह बात तो करने की मृत्यु के समय भगवान कृष्ण ने उसको बता दी थी लेकिन युद्ध शुरू होने से पहले क्या हुआ था और करण अपने पांचो पांडव भाई के पक्ष से युद्ध क्यों नहीं लड़ पाया था उनके खिलाफ क्यों खड़ा रहा जबकि उनके खिलाफ युद्ध न लड़े और उनके साथ में युद्ध लड़ाई यह बात कृष्ण भगवान ने भी उसको समझाई थी लेकिन उसके बाद भी राजी नहीं हुआ उसके राजी न होने के क्या-क्या कारण थे वह आपको इस वीडियो में बताने वाले हैं जिसके लिए वीडियो क्लिक करके पूरा देखिए और चैनल सब्सक्राइब करिए,

महाभारत काल में जिस टाइम पर पांडवों और कोर्बो में युद्ध होना तय हो गया था और दोनों पक्षों के सारे योद्धा सेनापति तैयार हो चुके थे ऐसे में पांडवों की माता की नहीं चाहती थी कि करण उसके भाई के सामने युद्ध लड़े और भगवान कृष्ण ये भी जानते थे कि कौरवों के पक्ष का अगर एक योद्धा पांडवों के पक्ष में आ जाए तो पांडवों को विजय प्राप्त करने में बहुत आसानी होगी उनकी विजय बिना किसी छल के लगभग पक्की हो जाएगी और उस योद्धा का नाम था करण ,,जिसके लिए भगवान कृष्ण ने प्रयास किया और स्वयं इसके लिए बात करने के करण के पास गए फिर दुर्योधन के अधर्मों का स्मरण करवाते हुए करण को उसके जन्म का रहस्य बताया कि वास्तव में वह पांडवों का बड़ा भाई है सूत पुत्र नहीं है वह यह बात नहीं जानता कि वह युद्ध में उसके ही परिवार के सामने लड़ने जा रहा है, करन ने भगवान कृष्ण की सारी बात को सुनने के बाद कहा कि आप ठीक कह रहे हो भगवान लेकिन मैं अपने जीवन में एक साइड सारे समाज को देखता हूं और एक साइड दुर्योधन को देखता हूं कि किसने मेरे लिए क्या किया किसने मुझे क्या दिया तो मेरा कर्तव्य केवल यही कहता है कि मैं दुर्योधन का साथ दूं क्योंकि दुर्योधन ने उस टाइम पर मेरा साथ दिया था जिस टाइम पर की यह सारा समाज सभी लोग मुझे सूत पुत्र कह रहे थे और मुझसे भेदबाब कर रहे थे दुर्योधन ने उस टाइम पर मुझको राज्य दिलवाया राजा बनाया मुझे सम्मान दिलवाया समाज में बैठने का अधिकार दिलवाया, इतने बड़े-बड़े उपकार कीये तो उसके इतने सारे उपकारों को भूलकर में जीवन के इतने बड़े संघर्ष में उसका साथ कैसे ना दूं, और मेरे सामने जो पांडव है वह मेरा ही परिवार है और वह सभी लोग धर्म के रास्ते पर हैं सत्कर्म के रास्ते पर हैं, और मैं यह भी जानता हूं कि इस युद्ध में विजय पांडवों की होगी क्योंकि उनके पक्ष में धर्मे और स्वयं आप यानी कि भगवान कृष्ण है लेकिन मैंने दुर्योधन को वचन दिया है उसका रक्षण करने का जीवन के पथ पर उसके साथ चलने का तो मे उसका त्याग नहीं कर सकता, अगर शुरुआत में इस बात की जानकारी होती कि मेरे और पांडवों के बीच में संबंध क्या है तो स्थिति भिन्न होती लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है, बाद में करण को उसकी माता कुंती के द्वारा भी समझाया गया लेकिन वह दुर्योधन का साथ छोड़ने का निर्णय न ले सका और उसके ही पक्ष से युद्ध लड़ा, अगर महाभारत काल में करण पांडवों की ओर से लड़ा होता कोरबो की ओर से नहीं तो पांडवों के लिए युद्ध जितना ज्यादा आसान होता है लेकिन करण ने दुर्योधन को वचन दिया था और उसके उपकारो के नीचे दबा था इसीलिए उसने दुर्योधन के साथ लड़ा और धर्म के पक्ष से लाडा इसलिए इतने बड़े योद्धा को पराजित होकर हार का सामना भी करना पड़ा , और धर्म के आगे अधर्म की जीत हुई

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